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यदि सामने होते तो सिर सहलाता.पीठ.........

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यदि सामने होते तो सिर सहलाता.पीठ ठोकता और कलम थामने वाले आपके हाथों को अपने सीने से लगाता.कल मुझे आपकी पुस्तक व्यंग्य का ककहरा मिली.मेरा मन मैंने आज टेलीफोन पर खोल दिया. आपसे बात हुई. आप में साहस हो तो अपने आपसे मेरी ये पंक्तियां कह कर देखो- कुछ आराम करो मेरी ग़ज़लो ! मैंने लिखना सीख लिया ना कवि की कसौटी पद्य नहीं गद्य को माना है.आपके इस व्यंग्य संग्रह के प्रत्येक पृष्ठ पर अनुप्रास श्लेष और यमक अलंकारों के उदाहरण गद्य की पगड़ी में तुर्रा लगाये बैठे हैं.वे गर्वित हैं. शब्दानुप्रास और अक्षरानुप्रास सब अनायास लगते हैं,सायास नहीं. आपसे यह हो गया. आपने किया नहीं. नये लोग बहुत सीख सकेंगे.  ककहरा के सभी आलेख पठनीय हैं.जो भी पढ़ेगा वह बंधा रह जाएगा.सरल और प्रांजल भाषा में कल कल करते ये लेख जटिल जीवन और कुटिल व्यवस्थाओं को मुस्कानें देते हैं. किसी भी सरकार में इतना दम नहीं है कि इस ककहरे का कोई एक वर्ण भी अपने छात्रों को पढऩे हेतु दे दें. बरहाल मेरी बधाई महेन्द्र! अपनी बात वैसे भी मैं फोन पर कह ही चुका हूं.  बालकवि बैरागी कवि नगर पोस्ट मनासा  जिला नीमच, मो. 9525106136 ...