व्यंग्य का ककहराः अभिनव शैली में अनूठी कृति
धर्मेन्द्र गुप्त साहिल
हिन्दी साहित्य में हास्य-व्यंग्य की एक लम्बी परंपरा रही है.भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बेढब बनारसी, रूद्र काशिकेय, शरद जोशी, हरिशंकर परसाई, रवीन्द्र नाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल, के.पी. सक्सेना, लतीफ घांेघी आदि रचनाकारों ने केवल हास्य व्यंग्य साहित्य को ही समृद्ध नहीं किया,वरन यह भी सिद्ध किया कि अपने समय की विसंगतियों, राजनीतिक भ्रष्टाचार, त्रासदी एवं विद्रपताओं पर सशक्त प्रहार करने का सबसे धारदार हथियार है व्यंग्य. वस्तुतः व्यंग्य रचनाओं में हास्य का पुट होने के कारण ये सीधे-सीधे पाठक तक सम्प्रेषित हो जाती हैं. संभवतः यही कारण है कि समर्थ ग़ज़लकार डाॅ.महेन्द्र अग्रवाल ने वर्तमान कालखंड की विसंगतियों को अभिव्यक्त करने के लिए व्यंग्य विधा का चयन किया.उनकी सद्यः प्रकाशित कृति ‘‘व्यंग्य का ककहरा‘‘ से गुज़रते हुए यह कहीं से नहीं लगता कि रचनाकार की यह प्रथम व्यंग्य कृति है. हिन्दी वर्णमाला के 29 अक्षरों को आधार बनाकर लेखक ने राजनीतिक,सामाजिक, सांस्कृतिक एवं लोकजीवन के वर्तमान यथार्थ को रोचक शैली में प्रस्तुत किया है. वर्तमान राजनीति का एक चित्र द्रष्टव्य है.
‘‘निःसंदेह कठमुल्लाओं के कठमुल्लेपन के कारण देश कठिन दौर से गुज़र रहा है किन्तु केन्द्र सरकार कठिनाइयों से जूझने का नाटक कर रही है.कठोरता दिखाने के समय वह विपक्षियों के क्र्रियाकर्म में व्यस्त है.कभी कभी तो कड़कने की जगह कत्थक करने लगती है.लगता है उसकी विराट कथा में कई कथांतर हैं.पटकथा लेखक शायद कहीं और है,शायद भ्रमित भी.उसे पात्रों की सही क़दर नहीं है.वह सभी को केवल क़दमताल देखना चाहता है.वह शायद उनकी कानाफूसी से विचलित होकर उन्हें कपटी समझता है.सब इसी दोषारोपण में एक दूसरे के कपड़े उतारने पर तुले हैं.विपक्षी तो यह हाल देखकर अपने कपड़ों में भी नहीं समा रहे.‘‘(क की करामात पृष्ठ 21-22)
व्यंग्य रचना में मुहावरों का प्रयोग उसकी पठनीयता एवं रोचकता में वृद्धि करता है,इस दृष्टि से यह पुस्तक अपनी सार्थकता सिद्ध करती है. महेन्द्र अग्रवाल का मुहावरा ज्ञान अनेक पृष्ठों पर दृष्टिगत होता है-‘‘अब किसी का ख़ून खौलता रहे या किसी की आंखों में ख़ून उतरता रहे.कोई ख़ून के आंसू रोये या ख़ून के आंसू पिये या ख़ून के आंसू पीते पीते किसी के ख़ून का प्यासा हो जाये.ऐसी परिस्थितियों में कुछ लोगों का ख़ून सूखने लगता है.‘‘(ख की ख़ारिश, पृष्ठ 27)
‘ज का जंजाल‘ में वे लिखते हैं-‘‘जी अच्छा हो तो ठीक है वरना सब बेकार. किसी पर जी आ जाये तो परेशानी.किसी से जी उकता जाये तो जि़न्दगी खराब,जी उदास हो जाये या जी कांपने लगे तो बैठे ठाले मुसीबत. लगता है किसी तरह जी हलका हो जाये, दुआ यही कि न कोई अपने जी को मार कर जिये और न किसी का किसी से जी खट्टा हो.‘‘(पृष्ठ 39)इसी प्रकार अनेक रचनाओं में विषयानुकूल मुहावरों का प्रयोग कृति में चार चांद लगा रहे हैं.
लेखक समाजवाद एवं लोकतंत्र की सही अर्थों में स्थापना देखना चाहता है और उसकी दृष्टि भी सकारात्मक है किंतु जब वह इस लोकतांत्रिक देश में सामान्य जन की दुर्दशा देखता है तो उसकी लेखनी में अनायास धार आ जाती है-‘‘ग़रीब को रहने का ठिकाना मिल जाये इससे बड़ी बात नहीं. वह ठिकाना ढूंढता है और सदा ठिकाने की बात करता है, भले ही उसे कोई ठौर ठिकाने से न रहने दे या कहीं ठिकाने ही क्यों न लगा दे. ठाकुरसाहब अपने पैसे भी ठिकाने लगाते हैं और मजदूरों को भी ठिकाने से लगाते रहते हैं. जनतंत्र उनके दरवाजे पर ठिठुरकर ठिठक जाता है.‘‘(ठ की ठठरी, पृष्ठ 45)
अनेक रचनाओं में व्यंग्य के साथ हास्य का मिश्रण पाठकीय रूचि में वृद्धि करता है-‘‘कभी धक धक गर्ल के दर्शनों से दर्शकांे का दिल धक धक करने लगता था.अब उनकी फिल्मों के लिये पहले जैसी धकापेल नहीं है.नई -नई हीरोइनें सज धज कर आ रही हंै .अब तो सजने धजने की भी ज्यादा जरूरत नहीं रही क्यांेकि कपड़ों के नाम पर धज्जियाॅं ही बची हंै .जिन पर अच्छा धड़ है वह धडं़ग दृश्यों से परहेज नहीं करतीं ,भले ही सारी दुनिया के दिल धड़कते रहें‘‘(ध की ध्वनिया,पृष्ठ 59ं) .
वर्तमान फिल्मों में बढ़ती जा रही अश्लीलता पर लेखक का हास्य मिश्रण उक्त व्यंग्य शब्दावली की दृष्टि से भी प्रशंसनीय है. टी.व्ही. चैनलों ने विज्ञापन का इन्द्रजाल फैलाकर युवा पीढ़ी को कितना गुमराह किया है, इसका एक चित्र दृष्टव्य है-‘‘मादा को देखकर मादकता छाना आम बात है.नर प्राकृतिक ढंग से मादक गंध छोड़ते हंै जो नहीं छोड़ पाते वह नये नये स्प्र,े नये नये डियो आज़माते हंै . टी.वी.पर ऐसे विशिष्ट गंध वाले स्प्रे को महिमा मंडित किया जाता है.उन्हें देखकर,संूघकर कई नवयौवनायंेे लोक लाज छोड़ कर दौड़ी चली आती हंै. (म का मगर,पृष्ठ 90)
वर्तमान समय में लोकाचार मात्र औपचारिकता हो गया है,उसमें संवेदना लुप्त हो रही है, यहां तक कि किसी की मृत्यु होने पर भी हम अपने आवश्यक काम निबटा कर ही शव यात्रा में शामिल होते हैं.लेखक के शब्दों में-‘‘शव शब्द बुरा है. शवपरीक्षा हो या शवदाह कौन देखना चाहता है?लोग इकठ्ठे भी होते हैं तो दूर दूर 
इधर उधर ही रहते हैं.शवयात्रा में साथ चलना भी किसे पसंद है?समय भी कहां हैं इतना?सब घर पर शकल दिखाकर सीधे मुक्तिधाम और वहां से पुनः घरवालों को शकल दिखाकर अपने अपने घर.इस बीच में मृतक के साथ मोबाइल से अपने दस काम भी निबटा देते हैं.कंधे बदलने वाले नहीं मिलते तो घर वाले भी मजबूरी में शववाहिका की व्यवस्था बनाये रखते हैं.और क्या करें बेचारे. (श की शंका, पृष्ठ 110)   
इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता है एक रचना में कई विषयों का समावेश.लेखक ने वर्तमान जीवन के विविध आयामों एवं पक्षों की गहराई से पड़ताल की है और उन्हें कुशलतापूर्वक चित्रित किया है. महेन्द्र अग्रवाल चूंकि मूलतः कवि हैं इसलिए अति संवेदनशील हैं और उनकी संवेदना की ऊष्मा पुस्तक की प्रत्येक रचना में महसूस की जा सकती है. निश्चित रूप से उनका समकालीन बोध, मुहावरे एवं लोकोक्तियों से समृद्ध भाषा, भावों एवं विचारों की विशिष्ट शैली में प्रस्तुति, नवीन बिम्ब एवं प्रतीक, सम्प्रेषणीयता आदि ऐसी विशेषताएं हैं जो इस कृति की पठनीयता सिद्ध करती हैं. अभिनव शैली में रची गई यह अनूठी कृति साहित्य प्रेमियों द्वारा समादृत होगी, ऐसा मेरा विश्वास है.
धर्मेन्द्र गुप्त साहिल
सं.समकालीन स्पंदन
के. 3/10-ए मां शीतला भवन
गायघाट, वाराणसी-221001
मो.-08935065229, 07275318940
व्यंग्य का ककहरा/डाॅ.महेन्द्र अग्रवाल/पृष्ठ 120/मूल्य 200 रु./नई ग़ज़ल प्रकाशन,शिवपुरी म.प्र.

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