व्यंग्य का ककहरा
डॉ. महेन्द्र अग्रवाल कुशल सम्पादक, शोधनिष्ठ अध्येता, मूल्य परक चिंतक और श्रेष्ठ गजलकार है, मैं उन्हें अच्छे साहित्यसेवी के रूप में ही जानता हूं परंतु उनकी नवीनतम कृति, व्यंग्य का ककहरा ने मुझे सुखद विस्मय में डाल दिया. वर्णाधारित व्यंग्य नितांत नयी अवधारणा है. यद्यपि आधुनिक मंच सेवियों ने व्यंग्य शब्द का जैसा अवमूल्यन (छीछालेदार) किया है, उससे अलग हटकर डॉ. अग्रवाल के व्यंग्य को व्यंजना धर्मी अर्थ भंगिमाओं से ही समझा जा सकता है.रचनाकार के पास प्रचुर शब्द भण्डार है. वह अपनी अभिव्यक्ति के लिए शब्दों की तलाश में भटकता नहीं, शब्द स्वयं उसके पास चले आते हैं. एक ध्यातव्य तथ्य यह है कि डॉ. अग्रवाल ने शब्दों को शब्द कोष की कैद से आज़ाद करके उन्हें अर्थ के विस्तृत अरण्य में ला खड़ा किया है,यह व्यंग्यकार का कौशल है. भाषिक रूप से समृद्ध प्रबुद्ध पाठकों के लिए यह रचना अत्यंत उपयोगी रहेगी.साहित्य जगत में इसका समादृत होना असंदिग्ध है. 

डाॅ.रामसनेही लाल शर्मा यायावर
86 तिलक नगर बाईपास रोड फीरोजाबाद 

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