तन्ज़ की सिनफ़े जदीद का मूजिदः डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल
तबसिरा निगार-यूसुफ जमाल
तंजो मिजाह अदब में वैसे ही जरूरी है जैसे खाने में नमक,अदब नस्री हो या शेअरी, दोनांे ही में तंजो-मिजाह के बहुत से नमूने मौजूद हैं मगर डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल का नस्री तंजिया शाहकार जो ‘व्यंग्य का ककहरा‘‘ यानी तंज का ‘हरफे तहज्जी‘ के नाम से शाया हुआ है, जो अपने आप में क़तई असली, मुनफरिद और अभी तक मालूम अदब में सबसे पहला शाहकार है, ऐसा मुआक़कर अदीबों और नाअकिदीन ने भी तस्लीम किया है.
हिन्दी के छत्तीस (36) में से उन्तीस (29) हुरूफ पर हावी है. हर हरूफ पर एक मुस्तकि़ल मज़मून है- जिसमें उस हरफ से शुरू होने वाले अल्फाज़ को एक हार में पिरो दिया गया है. मुसन्निफ का कमाल यह है कि यह शाहकार अल्फाज़ की भरमार और बेजा भरती से पाक है, मगर हर मज़मून के हर हर लफ्ज़ मअनी आफरीनी है, अस्रे हाजि़र के वारिदात का अलमिया और मौजूदा रूज़हानात पर बेबाक तबसिरा भी है. मसलन-तिकड़मबाज लोग चुनावों में अपनी तिकड़ी बनाये रखने के लिए दूसरों की तिजोरी उनके ही हाथ से खुलवा लेते हैं. तिलंगाना का मसला भी वैसे तिल भर का था किन्तु तिल का ताड़ बन गया. तिलक तराजू और तलवार इनमें मारो....... से तिलमिलाने वाले लोग ही हाथी नहीं गणेश है.... करने लगे. वक़्त बदलते या रंग बदलते देर नहीं लगती. इकहरा आदमी दुहरा भी जाता है और तिहरा भी होे जाता है. (त की तकरार से)
मुन्र्दजा वाला इक़तिवास को पढिए और सर धुनिए, तंज़ के साथ कितने अस्री रुजहानात की अक्कासी हैं, और फन्ने तंजनिगारी की हर दो किस्में यानी मज़ाहिया और अलमिया दोनों मौजूद हैं. चुनाव में चन्दे का चक्कर, जरा ज़रा सी बातों को तूल देना, खुशामद, और इब्नुलवक्री पर इशारे, दिलकश इश्तिआरे और मुहावरों का इस्तेमाल क़ाबिले तारीफ है. चूंकि ‘व्यंग्य के ककहरे‘ का मुसन्निफ असलन ग़ज़ल का शायर है और उसने बहुत कम उम्री में मुल्क और बेरूने मुल्क अपनी ‘नई ग़ज़ल‘ के वसीले से पहचान बना ली है, उनकी ग़ज़लों में समाजी नाहमवारी, रिश्तांे के बिखराब, बदउनवानी, समाज और सियासत में आला क़दरों और आदर्शों के फुकदान पर गहरी फिक्र और गम़ के अहसास की तर्जुमानी है और यही सब बअसलूवे दीगर इस तंजिया मज़मूऐ में भी नुमाया है.
धार्मिक पाखंडियों पर तंज का नमूना-चैत की फसल काटकर किसान चैन से बैठता है तो पक्षी चोंच से दाना चुगते हैं. रजनीश ने मेरून रंग का चोगा चलाया तो सही मगर चोखा साबित न हुआ. उनके चेले चोट्टों की तरह चोली के पीछे क्या है,ही ढूंढते रहे.
हिन्दी के माअ़रूफ अदीब व नाकि़द प्रोफेसर लखनलाल खरे ने इस मजमूऐ पर तबसिरा करते हुए किशानचन्द जैसी महशूर तंजनिगारों का जिक्र करने के बाद डाॅ.महेन्द्र अग्रवाल की इस काविश को क़तई असली, तजुर्वा नई सिनफ की ईजाद करार दिया है और लिखा है कि ‘हिन्दी अदब की तारीख में डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल का नाम इस नई सिनफ के तौर पर सुनहरे हुरूफ से लिखा जाएगा.
हिन्दी मशहूरो मारूफ बुजुर्ग अदीब व नाकिद प्रोफेसर डाॅ. परशुराम शुक्ल ‘विरही‘ ने लिखा है कि ‘डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल संजीदा तखलीकात से बोझिल नफसीयात की हालत को नई तवानाई देने के लिए तंज लिखते हैं.
मैं भी खुदा से दुआ करता हूं कि यह तंजिया तख़लीक़ डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल के लिए और उनकी नफसियात के लिए नई तवानाई का वाइस बने और उनकी संजीदा शेअरी तखलीक़ात में इज़ाफा करे. आमीन.
यूसूफ जमाल
हाजी यूसूफ अहमद कुरेशी
कल्लनसोप फेक्ट्री के सामने पुरानी शिवपुरी शिवपुरी म.प्र.




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