व्यंग्य विधा को नयी सृजनाकृति देती व्यंग्य कृति ‘‘व्यंग्य का ककहरा‘‘
समकालीन काव्य विधा के साधक कला कलाकार, चर्चित साहित्यक पत्रिका नयी ग़ज़ल के तेज तर्रार संपादक डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल की अदबी शख्सियत को मैं बतौर गीतकार ग़ज़लकार ही जानता था किंतु व्यंग्य पर उनकी पकड़ इतली पोख़्ता है.इसका अहसास नहीं था. सद्यः प्रकाशित व्यंग्य कृति व्यंग्य का ककहरा को पढ़कर मेरा यक़ीन और घनीभूत हो  गया.उनमें व्यंग्य की धार बहुत तीक्ष्ण और चुभने वाली है. अपने पूर्वालाप में डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल ने यह स्वीकार किया है,‘‘बरसों से ग़ज़ल विधा से जुड़ा रहा हूं और खुदा गवाह है कि ग़ज़ल या ग़ज़ल पर लिखने के अलावा मैंने और कुछ नहीं लिखा.ग़ज़ल लिखता हूं इसका भी कभी कोई दावा नहीं किया क्योंकि ग़ज़ल निरन्तर सीखते रहने वाली विधा है.अनायास व्यंग्य की ओर रुझान का कोई कारण खुद मेरी समझ में नहीं आया.‘‘डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल का संदर्भित अभिमत अपने वैचारिक आनुभूतिक कलेवर में ईमानदाराना है.आज साहित्य में इसी सोच का लोप होता जा रहा है. ग़ज़ल निरन्तर सीखते रहने वाली विधा है लिखकर अपनी समीक्षकीय सोच का सदाशयी सिलसिला मुहैया किया है. डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल एक मक़बूल ग़ज़लकार के साथ-साथ श्रेष्ठ इंसान हैं. उनकी अनेकशः कृतियां पुस्तक रूप में मंज़रे आम पर आ चुकी हैं. सर्वोच्च शिक्षा एम.एस.सी (जन्तुशास्त्र) और हिन्दी साहित्य में एम.ए. हैं. एल.एलबी और पी.एचडी. की सम्प्राप्ति से समन्वित उनका अ-क्षर व्यक्तित्व कई मआनी में महत्वपूर्ण है. डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल का प्रथमः सरोकार विज्ञान से रहा है.इसलिये वैज्ञानिक दृष्टि किसी भी विषय की पड़ताल में स्वाभाविक है. साहित्य के गहन अध्येता हैं इसलिए हर विधा के प्रति उनका नज़रिया साफ़ पाक है. कोई वैचारिक घालमेल उनकी सोच में नहीं .किसी भी बात को बेलौस किसी भी कीमत पर कह देना उनकी शख्सियत की खूबी है. हिन्दी उर्दू दोनांे ही काव्य मंचों पर उनकी सारस्वत गति कवि शायर के रूप में हैं. डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल शिवपुरी का नाम रौशन साहित्यिक आयोजकों की दमदार संयोजना से करते हैं. कहने का मन्तव्य सिर्फ़ इतना कि एक ही व्यक्ति में इतनी सारी खूबियों का अंतर्लीन होना अपने आप में एक मिसाल है.
डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल सु-कवि हंै, मर्मी-चिंतक कवि के नाम के नाते, समीक्षक, गीतकार, छंदकार, ग़ज़लकार और अब व्यंग्य-कृति ‘‘व्यंग्य का ककहरा‘‘ की बदौलत एक पुअसर व्यंग्यकार के रूप में भी इनकी शिनाख्त दर्ज होगी ऐसा विश्वास सहजतः कृति के अवलोकन से होता है. कृति पर क्रमशः तीन भूमिकात्मक आलेख क्रमशः डाॅ. परशुराम शुक्ल विरही प्रो. विद्यानंदन राजीव, डाॅ. लखनलाल खरे के हैं. तीनों ही अपने-अपने क्षेत्र के मंजे कसे साहित्यकार हैं और सौभाग्य से शिवपुरी के हैं. डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल की एक-एक साहित्यिक अदा के प्रत्यक्ष, चश्मदीद. प्रो. विद्यानंदन राजीव ने व्यंग्य-अक्षरा संज्ञक आलेख में व्यंग्य मनीषी हरिशंकर परसाई और शरद जोशी की व्यंग्य रचनाशीलता के माध्यम और हवाले से गद्य व्यंग्य की स्थापना की बात की है जो सौ फ़ीसद बाजिब है. बाद के गद्यकारों में मात्र रवीन्द्रनाथ त्यागी हैं जो व्यंग्य विधा की कसौटी पर पूर्णतया खरे उतरते हैं. बाक़ी की धार में वह कसाव, मजाव और रचाव का अभाव है जो संदर्भित व्यंग्यकारों में पैबस्त थी. डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल की व्यंग्य-कृति ‘‘व्यंग्य का ककहरा‘‘ अपने मुख पृष्ठ से ही व्यंग्य का आभास देना शुरू करती है. एक शाख पर तीन उल्लुओं की त्रयी की ख़ामोश मुद्रा इस बात की संकेतक है कि वे सघन सोच में डूब कर किसी अप्रत्याशित घटना को अंजाम देने के लिए विचार का जाल बुन रहे है. पुस्तक के कायिक कलेवर में प्रयोगधर्मी व्यंग्यकार महेन्द्र अग्रवाल ने प्रत्येक अक्षर की अस्मिता को केन्द्र में रखकर व्यंग्य  की धार को तेज़तरीन किया है. सामाजिक विसंगतियों पर नश्तरी चाकू की तरह चलते हुए व्यंग्य एक तिलमिलाहट पैदा करते हैं और गौर से विचार किया जाये तो लगता है कि महेन्द्र अग्रवाल संभावित खतरे से समाज को आगाह करते चलते हैं. जेनुइन क़लमकार चाहे जिस भी विधा, दिशा में समर्पित संकल्पित मन से होगा श्रेष्ठ  सृजनाकृति देगा. ऐसी बराबर अनुभूति इस कृति का पढ़ते हुए होती है. समय को इन्तिज़ार है कि डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल हिन्दी नयी ग़ज़ल, गद्य व्यंग्य, समीक्षा सहित किन-किन विधाओं में अपने कलम की गुलकारियां करते हैं. मुझे व्यक्तिगत रूप से विश्वास है कि ये जहां जिस विधा में होंगे अपनी अलहदा पहचान के साथ होंगे. 

डाॅ.मधुर नज़्मी
काव्यमुखी साहित्य अकादमी
गोहना मुहम्मदाबाद जिला मऊ

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