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यदि सामने होते तो सिर सहलाता.पीठ.........

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यदि सामने होते तो सिर सहलाता.पीठ ठोकता और कलम थामने वाले आपके हाथों को अपने सीने से लगाता.कल मुझे आपकी पुस्तक व्यंग्य का ककहरा मिली.मेरा मन मैंने आज टेलीफोन पर खोल दिया. आपसे बात हुई. आप में साहस हो तो अपने आपसे मेरी ये पंक्तियां कह कर देखो- कुछ आराम करो मेरी ग़ज़लो ! मैंने लिखना सीख लिया ना कवि की कसौटी पद्य नहीं गद्य को माना है.आपके इस व्यंग्य संग्रह के प्रत्येक पृष्ठ पर अनुप्रास श्लेष और यमक अलंकारों के उदाहरण गद्य की पगड़ी में तुर्रा लगाये बैठे हैं.वे गर्वित हैं. शब्दानुप्रास और अक्षरानुप्रास सब अनायास लगते हैं,सायास नहीं. आपसे यह हो गया. आपने किया नहीं. नये लोग बहुत सीख सकेंगे.  ककहरा के सभी आलेख पठनीय हैं.जो भी पढ़ेगा वह बंधा रह जाएगा.सरल और प्रांजल भाषा में कल कल करते ये लेख जटिल जीवन और कुटिल व्यवस्थाओं को मुस्कानें देते हैं. किसी भी सरकार में इतना दम नहीं है कि इस ककहरे का कोई एक वर्ण भी अपने छात्रों को पढऩे हेतु दे दें. बरहाल मेरी बधाई महेन्द्र! अपनी बात वैसे भी मैं फोन पर कह ही चुका हूं.  बालकवि बैरागी कवि नगर पोस्ट मनासा  जिला नीमच, मो. 9525106136 ...
आपकी क से कलम ख से खरी,ग से गतिमय,घ से घनघोर,च से चपल, छ से छबीली,ज से जनोन्मुखी,झ से झकझोरी ट से टंकारमयी,ठ से ठगिनी,ड से डमरूनुमा ढ से ढपली सदृश, त से तेजतर्रार, थ से थाहमापी द से दनादन चलित, ध से धधकयुक्त, न से नवीना प से प्रवीणा, फ से फर्तीली, बस से बलखाती भ से भीषण, म से मार्मिक, य से यथास्थिति विरोधी र से रमणीया, ल से लालित्यपूर्ण, व से वेगवती श से शब्दशक्तिवान, ष से षटरसी, स से सरल, ह से है और  क्ष से क्षरणविहीना, त्र से त्राता और ज्ञ से ज्ञाता भी प्रिय महेन्द्र भाई! इस प्रयोगधर्मी व्यंग्य-संकलन के व्यंजन-प्रयोग और व्यंजना-योग के लिए हार्दिक बधाई! डाॅ.अशोक चक्रधर  जे 116,सरिता विहार नई दिल्ली
व्यंग्य का ककहरा श्री महेन्द्र अग्रवाल प्रधानतः अपनी गजलों के लिए विख्यात हंै किंतु उनकी सद्य प्रकाशित कृति व्यंग्य का ककहरा से उनके रचनाकार का अनेकमुखी होना सहज सिद्ध हो रहा है. श्री महेन्द्र की यह कृति हास्य-व्यंग्य की दुनिया में सर्वथा नये रंग रूप में प्रस्तुत हो रही हैं. उसमें उन्होंने व्यंग्यालेखों को व्यंजन वर्णों के क्रम से संयोजित कर एक अपूर्व प्रयोग सिद्ध किया है. इन आलेखों में उनकीे मौलिक दृष्टि विशेष रूप् से प्रदर्शित हुई है.हास्य व्यंग्य के क्षेत्र में उन्होंने निश्चित ही नई ज़मीन तोड़ी है.  श्री महेन्द्र का रचनाफलक सुविस्तृत है. उसमें समाज, राजनीति, धर्मदर्शन, नेता-अभिनेता आदि तो हैं ही भाषा विज्ञान, स्वर शास्त्र, पुरातत्व-जीवाश्म इत्याति विश्व की सभी सत्ताएं उपस्थित हैं. उनके व्यंग्यों को पढ़ते हुए कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपनी व्यंग्य प्रतिभा के सहारे ललित निबंधों के राजमहल में तो सेंध नहीं लगा रहे.  श्री महेन्द्र के इन व्यंग्यालेखों में अनुप्रास की छटा विशेष रूप से  दर्शनीय है वह उनके व्यंग्याकार को विशिष्ट छवि प्रदान करती है. यह कृति अन...
व्यंग्य का ककहराः अभिनव शैली में अनूठी कृति धर्मेन्द्र गुप्त साहिल हिन्दी साहित्य में हास्य-व्यंग्य की एक लम्बी परंपरा रही है.भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बेढब बनारसी, रूद्र काशिकेय, शरद जोशी, हरिशंकर परसाई, रवीन्द्र नाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल, के.पी. सक्सेना, लतीफ घांेघी आदि रचनाकारों ने केवल हास्य व्यंग्य साहित्य को ही समृद्ध नहीं किया,वरन यह भी सिद्ध किया कि अपने समय की विसंगतियों, राजनीतिक भ्रष्टाचार, त्रासदी एवं विद्रपताओं पर सशक्त प्रहार करने का सबसे धारदार हथियार है व्यंग्य. वस्तुतः व्यंग्य रचनाओं में हास्य का पुट होने के कारण ये सीधे-सीधे पाठक तक सम्प्रेषित हो जाती हैं. संभवतः यही कारण है कि समर्थ ग़ज़लकार डाॅ.महेन्द्र अग्रवाल ने वर्तमान कालखंड की विसंगतियों को अभिव्यक्त करने के लिए व्यंग्य विधा का चयन किया.उनकी सद्यः प्रकाशित कृति ‘‘व्यंग्य का ककहरा‘‘ से गुज़रते हुए यह कहीं से नहीं लगता कि रचनाकार की यह प्रथम व्यंग्य कृति है. हिन्दी वर्णमाला के 29 अक्षरों को आधार बनाकर लेखक ने राजनीतिक,सामाजिक, सांस्कृतिक एवं लोकजीवन के वर्तमान यथार्थ को रोचक शैली में प्रस्तुत किया ...
तन्ज़ की सिनफ़े जदीद का मूजिदः डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल तबसिरा निगार-यूसुफ जमाल तंजो मिजाह अदब में वैसे ही जरूरी है जैसे खाने में नमक,अदब नस्री हो या शेअरी, दोनांे ही में तंजो-मिजाह के बहुत से नमूने मौजूद हैं मगर डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल का नस्री तंजिया शाहकार जो ‘व्यंग्य का ककहरा‘‘ यानी तंज का ‘हरफे तहज्जी‘ के नाम से शाया हुआ है, जो अपने आप में क़तई असली, मुनफरिद और अभी तक मालूम अदब में सबसे पहला शाहकार है, ऐसा मुआक़कर अदीबों और नाअकिदीन ने भी तस्लीम किया है. हिन्दी के छत्तीस (36) में से उन्तीस (29) हुरूफ पर हावी है. हर हरूफ पर एक मुस्तकि़ल मज़मून है- जिसमें उस हरफ से शुरू होने वाले अल्फाज़ को एक हार में पिरो दिया गया है. मुसन्निफ का कमाल यह है कि यह शाहकार अल्फाज़ की भरमार और बेजा भरती से पाक है, मगर हर मज़मून के हर हर लफ्ज़ मअनी आफरीनी है, अस्रे हाजि़र के वारिदात का अलमिया और मौजूदा रूज़हानात पर बेबाक तबसिरा भी है. मसलन-तिकड़मबाज लोग चुनावों में अपनी तिकड़ी बनाये रखने के लिए दूसरों की तिजोरी उनके ही हाथ से खुलवा लेते हैं. तिलंगाना का मसला भी वैसे तिल भर का था किन्तु ति...
व्यंग्य विधा को नयी सृजनाकृति देती व्यंग्य कृति ‘‘व्यंग्य का ककहरा‘‘ समकालीन काव्य विधा के साधक कला कलाकार, चर्चित साहित्यक पत्रिका नयी ग़ज़ल के तेज तर्रार संपादक डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल की अदबी शख्सियत को मैं बतौर गीतकार ग़ज़लकार ही जानता था किंतु व्यंग्य पर उनकी पकड़ इतली पोख़्ता है.इसका अहसास नहीं था. सद्यः प्रकाशित व्यंग्य कृति व्यंग्य का ककहरा को पढ़कर मेरा यक़ीन और घनीभूत हो  गया.उनमें व्यंग्य की धार बहुत तीक्ष्ण और चुभने वाली है. अपने पूर्वालाप में डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल ने यह स्वीकार किया है,‘‘बरसों से ग़ज़ल विधा से जुड़ा रहा हूं और खुदा गवाह है कि ग़ज़ल या ग़ज़ल पर लिखने के अलावा मैंने और कुछ नहीं लिखा.ग़ज़ल लिखता हूं इसका भी कभी कोई दावा नहीं किया क्योंकि ग़ज़ल निरन्तर सीखते रहने वाली विधा है.अनायास व्यंग्य की ओर रुझान का कोई कारण खुद मेरी समझ में नहीं आया.‘‘डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल का संदर्भित अभिमत अपने वैचारिक आनुभूतिक कलेवर में ईमानदाराना है.आज साहित्य में इसी सोच का लोप होता जा रहा है. ग़ज़ल निरन्तर सीखते रहने वाली विधा है लिखकर अपनी समीक्षकीय सोच का सदाशयी सिलसिला मुहै...
व्यंग्य रचना की व्यंग्यात्मक समीक्षा साहित्य की नई वर्णमाला “व्यंग्य का ककहरा” डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल को लोग सिर्फ़ ग़ज़लगों समझने का घोर अपराध करते रहते हैं. इस गुनाह में, मैं भी शामिल रहा हूं. इसलिए मुझ पर भी अपराध सिद्ध होने के भरपूर इम्कानात नज़र आते हैं. शायद मेरी सजा कुछ कम हो जाए इस नियत से मैंने उक्त किताब के मुख्य पृष्ठ (सरेवर्क) को देखते ही चंद मिस्रे सीधे किए हैं जिन्हें मुलाहिज़ा फ़रमाकर आप भी उलटियां कीजिए. शाख़ पर तीन उल्लू बैठे हैं एक दूजे से जो ये कहते हैं हमसे बेहतर तो हैं ये इंसा, जो सबको उल्लू बनाते रहते हैं और फिर तीनों ज़ोर से शाहीं व्यंग्य का क़हक़हा लगाते हैं हज़रात अब उलटियां करना बंद कीजिए और संजीदगी से इस बात पर ग़ौर फ़रमाइए कि डाॅ. अग्रवाल ने गांधी जी के तीन बंदरों के मद्दे-मुक़ाबिल अपने तीन उल्लूओं को मैदान -ए-तंज़ो-मिज़ाह में उतारकर फांसी पर चढ़ाए जाने वाला अपराध किया जो इस तरह माफि़ज़्ज़मीर वाज़ेह करने की गुस्ताखी करते हैं-‘‘क की करामात,ख़ की ख़ारिश,ग का गोबर ,घ का घर ,च की चकल्लस,छ की छाजन,ज का जंजाल,झ का झण्डा,ट की टंकार,ठ की ठठरी,...