व्यंग्य का ककहरा
श्री महेन्द्र अग्रवाल प्रधानतः अपनी गजलों के लिए विख्यात हंै किंतु उनकी सद्य प्रकाशित कृति व्यंग्य का ककहरा से उनके रचनाकार का अनेकमुखी होना सहज सिद्ध हो रहा है.
श्री महेन्द्र की यह कृति हास्य-व्यंग्य की दुनिया में सर्वथा नये रंग रूप में प्रस्तुत हो रही हैं. उसमें उन्होंने व्यंग्यालेखों को व्यंजन वर्णों के क्रम से संयोजित कर एक अपूर्व प्रयोग सिद्ध किया है. इन आलेखों में उनकीे मौलिक दृष्टि विशेष रूप् से प्रदर्शित हुई है.हास्य व्यंग्य के क्षेत्र में उन्होंने निश्चित ही नई ज़मीन तोड़ी है. 
श्री महेन्द्र का रचनाफलक सुविस्तृत है. उसमें समाज, राजनीति, धर्मदर्शन, नेता-अभिनेता आदि तो हैं ही भाषा विज्ञान, स्वर शास्त्र, पुरातत्व-जीवाश्म इत्याति विश्व की सभी सत्ताएं उपस्थित हैं. उनके व्यंग्यों को पढ़ते हुए कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपनी व्यंग्य प्रतिभा के सहारे ललित निबंधों के राजमहल में तो सेंध नहीं लगा रहे. 
श्री महेन्द्र के इन व्यंग्यालेखों में अनुप्रास की छटा विशेष रूप से  दर्शनीय है वह उनके व्यंग्याकार को विशिष्ट छवि प्रदान करती है.
यह कृति अनेक अनूठे प्रयोगों, चुटीली अभिव्यक्तियों तथा चटपटे किंतु सुचिंतित विचारों के कारण साहित्य जगत में सुचर्चित एवं समादृत होगी और उसके माध्यम से व्यंग्य विधा के संवर्द्धन समुन्नयन में डॉ. महेन्द्र अग्रवाल का योगदान भी रेखांकित होगा. 

जगदीश तोमर, 
निदेशक प्रेमचंद सृजनपीठ, 
उज्जैन म.प्र.
व्यंग्य का ककहरा/डॉ. महेन्द्र अग्रवाल/प्रथम संस्करण 2013/मूल्य 200 रुपये/नई ग़ज़ल प्रकाशन शिवपुरी म.प्र.

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