प्रयोगधर्मी व्यंग्य का ककहरा
डॉ. महेन्द्र अग्रवाल जैसा कि उनकी नवीनतम कृति व्यंग्य का ककहरा से विदित है, केवल पद्यात्मक ग़ज़ल के प्रति ही समर्पित नहीं हैं, उनका रुझान गद्यात्मक व्यंग्य-लेखन की ओर भी उतना ही है. उनका गद्य और पद्य दोनों पर ही समान अधिकार हैं,उनकी यह ताजातरीन पेशकश चमत्कृत करती है. तन्ज के तीर और नश्तर तो ग़ज़लों में भी होते हैं, परंतु इतनी प्रचुर संख्या में नहीं जितने कि इस व्यंग्य-संग्रह में देखने को मिलते हैं और वह भी क्रमबद्ध-तीखे, चुटीले और नुकीले, जो मर्मस्थल को गुदगुदाते भी हैं और साथ ही उनका ऐसा प्रभाव होता है कि जैसे किसी की दुखती नस पर हाथ रख दिया हो अथवा किसी की चोरी पकड़ी गई हो. वह बस सिटपिटका कर रह जाते हैं. उनके चेहरों के उतार-चढ़ाव देखते ही बनते हैं, डॉ. अग्रवाल ने व्यंग्यों को ककहरे के रूप में प्रस्तुत करके, इस अनोखे व्यंग्य- संग्रह को शब्द कोशीय बना दिया है. इसका एक बड़ा लाभ यह हुआ है कि उनके किसी भी व्यंग्य को सरलता-पूर्वक,यथास्थान, देख-पढ़कर उसका पूरा-पूरा आनंद उठाया जा सकता है.उन्हें जो भी व्यंग्य सूझा है, उसे 29 व्यंजनों से प्रारंभ होने वाले ककहरे की परिधि से लाया गया है. उदाहरणार्थ, व्यंजन र के प्रारंभ होने वाला शब्द रचना से संबंधित उनका निम्नांकित रोचक व्यंग्य दृष्टव्य है-
रचना, कविता या कहानी को भी कहते हैं किंतु यह हमारे पड़ोसी की एक लड़की का नाम भी है जिसके प्रेम और विरह में मुहल्ले में कई कवि अवतरित हुए और रचनाएं करने लगे.दो-चार तो वाकई प्रेम-ग्रंथ के रचयिता बन गये,दुर्भाग्य यही रहा कि आलोचककों ने उन्हें जायसी या घनानंद की तरह स्वीकार नहीं किया.
अपने पूर्वालाप में डॉ. अग्रवाल ने तो यहां तक लिखा है कि ‘‘खैर मुझे खुदा ने ग़ज़ल के लिए बनाया हैलेकिन जायका बदलने के लिए लिखे गए इन लेखों से भी मुझे ग़ज़ल जितना ही आनंद आया.‘‘जहां तक डॉ. अग्रवाल की ग़ज़लों का संबंध है, उन्होंने व्यंग्यार्थ को जो काव्य की आत्मा है, अपनी ग़ज़लों में प्रतिष्ठित करने का सद्प्रयास किया है. यह व्यंग्यार्थ उनके ककहरे वाले व्यंग्जनों से सर्वथा भिन्न है, यह वह व्यंग्यार्थ है जो वाच्यार्थ से परे ध्वनित होता है तथा ग़ज़ल के शेरों को अर्थ घनत्व प्रदान करता है. डॉ. अग्रवाल ने गजलों को नई दिशा दी है तथा स्वयं द्वारा कुशलता पूर्वक संपादित स्तरीय पत्रिका नई ग़ज़ल के माध्यम से वे ग़ज़लकारों का समुचित मार्गदर्शन करते आ रहे हैं.आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि डॉ. अग्रवाल की सशक्त एवं ऊर्जावान लेखनी उपर्युक्त दोनों ही विधाओं में समान गति से आगे बढ़ते हुए नए-नए कीर्तिमान स्थापित करेगी.
व्यंग्य का ककहरा/डॉ. महेन्द्र अग्रवाल/प्रथम संस्करण 2013/मूल्य 200 रुपये/नई ग़ज़ल प्रकाशन शिवपुरी म.प्र.
आर.पी. शर्मा महर्षि
फ्लेट नं. 402,प्लाॅट नं. 11 ए,
श्रीराम निवास टट्टा निवासी हाउसिंग सोसायटी,
पेस्टम सागर रोड़ नं.3 घाट कोपर माहुल रोड़ चेम्बूर मुम्बई (महाराष्ट्र)4000089
डॉ. महेन्द्र अग्रवाल जैसा कि उनकी नवीनतम कृति व्यंग्य का ककहरा से विदित है, केवल पद्यात्मक ग़ज़ल के प्रति ही समर्पित नहीं हैं, उनका रुझान गद्यात्मक व्यंग्य-लेखन की ओर भी उतना ही है. उनका गद्य और पद्य दोनों पर ही समान अधिकार हैं,उनकी यह ताजातरीन पेशकश चमत्कृत करती है. तन्ज के तीर और नश्तर तो ग़ज़लों में भी होते हैं, परंतु इतनी प्रचुर संख्या में नहीं जितने कि इस व्यंग्य-संग्रह में देखने को मिलते हैं और वह भी क्रमबद्ध-तीखे, चुटीले और नुकीले, जो मर्मस्थल को गुदगुदाते भी हैं और साथ ही उनका ऐसा प्रभाव होता है कि जैसे किसी की दुखती नस पर हाथ रख दिया हो अथवा किसी की चोरी पकड़ी गई हो. वह बस सिटपिटका कर रह जाते हैं. उनके चेहरों के उतार-चढ़ाव देखते ही बनते हैं, डॉ. अग्रवाल ने व्यंग्यों को ककहरे के रूप में प्रस्तुत करके, इस अनोखे व्यंग्य- संग्रह को शब्द कोशीय बना दिया है. इसका एक बड़ा लाभ यह हुआ है कि उनके किसी भी व्यंग्य को सरलता-पूर्वक,यथास्थान, देख-पढ़कर उसका पूरा-पूरा आनंद उठाया जा सकता है.उन्हें जो भी व्यंग्य सूझा है, उसे 29 व्यंजनों से प्रारंभ होने वाले ककहरे की परिधि से लाया गया है. उदाहरणार्थ, व्यंजन र के प्रारंभ होने वाला शब्द रचना से संबंधित उनका निम्नांकित रोचक व्यंग्य दृष्टव्य है-
रचना, कविता या कहानी को भी कहते हैं किंतु यह हमारे पड़ोसी की एक लड़की का नाम भी है जिसके प्रेम और विरह में मुहल्ले में कई कवि अवतरित हुए और रचनाएं करने लगे.दो-चार तो वाकई प्रेम-ग्रंथ के रचयिता बन गये,दुर्भाग्य यही रहा कि आलोचककों ने उन्हें जायसी या घनानंद की तरह स्वीकार नहीं किया.
अपने पूर्वालाप में डॉ. अग्रवाल ने तो यहां तक लिखा है कि ‘‘खैर मुझे खुदा ने ग़ज़ल के लिए बनाया हैलेकिन जायका बदलने के लिए लिखे गए इन लेखों से भी मुझे ग़ज़ल जितना ही आनंद आया.‘‘जहां तक डॉ. अग्रवाल की ग़ज़लों का संबंध है, उन्होंने व्यंग्यार्थ को जो काव्य की आत्मा है, अपनी ग़ज़लों में प्रतिष्ठित करने का सद्प्रयास किया है. यह व्यंग्यार्थ उनके ककहरे वाले व्यंग्जनों से सर्वथा भिन्न है, यह वह व्यंग्यार्थ है जो वाच्यार्थ से परे ध्वनित होता है तथा ग़ज़ल के शेरों को अर्थ घनत्व प्रदान करता है. डॉ. अग्रवाल ने गजलों को नई दिशा दी है तथा स्वयं द्वारा कुशलता पूर्वक संपादित स्तरीय पत्रिका नई ग़ज़ल के माध्यम से वे ग़ज़लकारों का समुचित मार्गदर्शन करते आ रहे हैं.आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि डॉ. अग्रवाल की सशक्त एवं ऊर्जावान लेखनी उपर्युक्त दोनों ही विधाओं में समान गति से आगे बढ़ते हुए नए-नए कीर्तिमान स्थापित करेगी.
व्यंग्य का ककहरा/डॉ. महेन्द्र अग्रवाल/प्रथम संस्करण 2013/मूल्य 200 रुपये/नई ग़ज़ल प्रकाशन शिवपुरी म.प्र.
आर.पी. शर्मा महर्षि
फ्लेट नं. 402,प्लाॅट नं. 11 ए,
श्रीराम निवास टट्टा निवासी हाउसिंग सोसायटी,
पेस्टम सागर रोड़ नं.3 घाट कोपर माहुल रोड़ चेम्बूर मुम्बई (महाराष्ट्र)4000089
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