आपकी क से कलम ख से खरी,ग से गतिमय,घ से घनघोर,च से चपल, छ से छबीली,ज से जनोन्मुखी,झ से झकझोरी ट से टंकारमयी,ठ से ठगिनी,ड से डमरूनुमा ढ से ढपली सदृश, त से तेजतर्रार, थ से थाहमापी द से दनादन चलित, ध से धधकयुक्त, न से नवीना प से प्रवीणा, फ से फर्तीली, बस से बलखाती भ से भीषण, म से मार्मिक, य से यथास्थिति विरोधी र से रमणीया, ल से लालित्यपूर्ण, व से वेगवती श से शब्दशक्तिवान, ष से षटरसी, स से सरल, ह से है और क्ष से क्षरणविहीना, त्र से त्राता और ज्ञ से ज्ञाता भी प्रिय महेन्द्र भाई! इस प्रयोगधर्मी व्यंग्य-संकलन के व्यंजन-प्रयोग और व्यंजना-योग के लिए हार्दिक बधाई! डाॅ.अशोक चक्रधर जे 116,सरिता विहार नई दिल्ली
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