व्यंग्य रचना की व्यंग्यात्मक समीक्षा
साहित्य की नई वर्णमाला “व्यंग्य का ककहरा”
डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल को लोग सिर्फ़ ग़ज़लगों समझने का घोर अपराध करते रहते हैं. इस गुनाह में, मैं भी शामिल रहा हूं. इसलिए मुझ पर भी अपराध सिद्ध होने के भरपूर इम्कानात नज़र आते हैं. शायद मेरी सजा कुछ कम हो जाए इस नियत से मैंने उक्त किताब के मुख्य पृष्ठ (सरेवर्क) को देखते ही चंद मिस्रे सीधे किए हैं जिन्हें मुलाहिज़ा फ़रमाकर आप भी उलटियां कीजिए.
शाख़ पर तीन उल्लू बैठे हैं
एक दूजे से जो ये कहते हैं
हमसे बेहतर तो हैं ये इंसा, जो
सबको उल्लू बनाते रहते हैं
और फिर तीनों ज़ोर से शाहीं
व्यंग्य का क़हक़हा लगाते हैं
हज़रात अब उलटियां करना बंद कीजिए और संजीदगी से इस बात पर ग़ौर फ़रमाइए कि डाॅ. अग्रवाल ने गांधी जी के तीन बंदरों के मद्दे-मुक़ाबिल अपने तीन उल्लूओं को मैदान -ए-तंज़ो-मिज़ाह में उतारकर फांसी पर चढ़ाए जाने वाला अपराध किया जो इस तरह माफि़ज़्ज़मीर वाज़ेह करने की गुस्ताखी करते हैं-‘‘क की करामात,ख़ की ख़ारिश,ग का गोबर ,घ का घर ,च की चकल्लस,छ की छाजन,ज का जंजाल,झ का झण्डा,ट की टंकार,ठ की ठठरी,ड का डमरू,ढ के ढंग,त की तारीख़,थ की थकन,द का दर्द,ध के धनुष,न के नंगे,प की पतंग,फ की फ्राॅक ,ब की बाक़ी ,भ की भंगिमायें,म का मगर,.य का यथार्थ,र की रंगीनियां,ल की लंतरानी ,व की वंशावली,श की शंका,स का संबोधन,ह के हंगामे ‘‘
इस घिनौने अपराध के सबब जब अदबी थाने का थानेदार डाॅ. अग्रवाल को गिरफ्तार करके, और अदबी दण्ड संहिता की सभी धाराएं लगाकर उन्हें अदबी अदालत में पेश करता है तो बेचारे अग्रवाल साहब अदबी दुनिया के नामवर आड़े-टेढे और तिरछे-बांके अदबी मुनसिफ़ों के समक्ष गिड़गिड़ाते हुए, अदबी ग्रंथों पर हाथ रखकर इस प्रकार हलफि़या बयान देते हैं कि माय लाॅर्ड मैं-‘‘बरसों से ग़ज़ल विधा से जुड़ा रहा हूं और खुदा गवाह है कि ग़ज़ल या ग़ज़ल पर लिखने के अलावा मैंने और कुछ नहीं लिखा.ग़ज़ल लिखता हूं इसका भी कभी कोई दावा नहीं किया क्योंकि ग़ज़ल निरन्तर सीखते रहने वाली विधा है.अनायास व्यंग्य की ओर रुझान का कोई कारण खुद मेरी समझ में नहीं आया. (‘‘व्यंग्य का ककहरा पृष्ठ 19)
अदब की इस अदालत में तीन बड़े अधिवक्ताओं अर्थात् डाॅ. परशुराम शुक्ल विरही, प्रो. विद्यानंदन राजीव और डाॅ. लखनलाल खरे ने भी डाॅ. अग्रवाल के पक्ष में अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं. सर्व प्रथम डाॅ. विरही ने कहा कि-‘‘विख्यात ग़ज़़लकार, नई गज़ल के उन्नायक और नई ग़ज़़ल पत्रिका के यशस्वी संपादक डॉ. महेन्द्र अग्रवाल गंभीर लेखन की बोझिल मानसिक स्थिति को नवस्फूर्ति देने के लिए व्यंग्य लिखते हैं। ऐसी स्थिति किसी -किसी साहित्यकार की होती है। एक बार रागदरबारी के यशस्वी लेखक श्रीलाल शुक्ल ने कहा था कि कोई भी गंभीर पुस्तक लिखने के बाद अपनी मानसिकता का बोझ कम करने के लिए वे व्यंग्य लिखते हैं‘‘
डाॅ. अग्रवाल के पक्षधर दूसरे अधिवक्ता प्रो. विद्यानंदन राजीव ने साहित्य के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रमाणित रूप से कहा कि-‘‘प्रख्यात गीत कवि और यशस्वी संपादक स्व. रामानंद दोषी कादम्बिनी पत्रिका में अपना संपादकीय बिंदु बिंदु विचार शीर्षक के रूप में देते थे.लगभग उसी शैली में डॉ.महेन्द्र अग्रवाल ने अपने इस रचना कर्म को रुपाकार प्रदान किया है.यह अंतर अवश्य दृष्टव्य है कि उनका यह विचार मंथन एक निश्चित वर्ण पर ही केन्द्रित रहा है. ये व्यंग्यलेख, एक विलक्षण रोचक शैली में रचे गये हैं. एक बार पढऩा आरंभ करने के बाद पाठक की रूचि और कौतूहल बढ़ता ही जाता है. हमें यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं दिखती कि यह मौलिक प्रयोग,व्यंग्य-साहित्य की भी वृद्धि में असाधारण सहयोग प्रदान करेगा और डॉ. महेन्द्र अग्रवाल को एक मनीषी व्यंग्यकार के रूप में स्थापित करने में सहायक होगा. 
और अंत में डाॅ. लखनलाल खरे ने पुरजोर तरीके से डाॅ. अग्रवाल के बचाव में अदालत के समक्ष एक मंझे हुए अधिवक्ता की हैसियत से यह वाजेह करने की कोशिश की कि डाॅ. महेन्द्र ने - गद्य-व्यंग्य के शिल्प में सर्वथा मौलिक प्रयोग किया है.इन्होंने बारहखड़ी को अपने गद्य-व्यंग्य-लेखन का आधार बनाते हुए एक नई विधा का प्रवर्तन किया है.बारहखड़ी के चमत्कार प्रदर्शन के फेर में इन आलेखों में अनावश्यक शब्दाडम्बर और वाग्विलास नहीं है.भाव सम्प्रेषण में कोई अवरोध नहीं है.विवेच्य कृति की ये विशेषतायें रेखांकन योग्य हैं.इक्कीसवीं शताब्दी के हिन्दी साहित्य का इतिहास जब भी लिखा जायेगा,डॉ. महेन्द्र का नाम इस नवीन विधा के प्रवर्तक के रूप में उन पृष्ठों पर सादर अंकित किया जाएगा.(व्यंग्य का ककहरा पृष्ठ-18)
लेकिन अफ़सोस कि साहित्य की सर्वोच्च न्यायपालिका के मठाधीशनुमा न्यायाधीशों की हठधर्मी के आगे डाॅ. विरही, डाॅ. राजीव और डाॅ. खरे की सभी दलीलें खोटी साबित हुई. मुन्सिफों की फुलबैंच ने व्यंग्य विधा में डाॅ. अग्रवाल की इस घुसपैठ को अनुचित समझा और सभी प्रकार की दलील और अपील नाकाम साबित हुई.
मुन्सिफ़ों ने इत्तेफ़ाके राय से ये फै़सला सादिर फ़रमाया कि यह अदालत डाॅ. अग्रवाल को दोषी मानते हुए यह आदेश देती है कि वे तादमे-हयात अर्थात् जीवन पर्यन्त व्यंग्य विधा में इसी प्रकार की पुस्तकें लिखते रहें, साथ ही उन्हें यह भी हुक्म दिया जाता है कि वे हर रोज हास्य-व्यंग्य प्रधान गद्य रचनाएं प्रस्तुत करके पाठकों और सामाईन का हाज़मा खराब करते रहे.ये दोनों सजाएं एक साथ डाॅ. अग्रवाल को भुगतनी होगी.
अदालत का फै़सला सुनते ही डाॅ. अग्रवाल चीखने, चिल्लाने और गिड़गिड़ाने लगे. उन्होंने कहा कि क़ाबिले-एहतिराम जज साहिबान मैं बेकुसूर हूं. मुझे इतनी बड़ी सज़ा मत दीजिए. मुझ ग़रीब साहित्यकार पर रहम कीजिए. यह मेरी पहली ग़लती है, मैंने सुना है कि पहली गलती को अदालत मुआफ़ करती है, लेकिन सद अफ़सोस कि साहित्यिक न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अपना फ़ैसला सुनाने के बाद क़लम तोड़कर स्याही पी चुके थे और जैसे ही सभी जज साहिबान अपनी-अपनी कुर्सियां छोड़कर अपने चेम्बर में जाने लगे तभी दो हट्ठे-कट्ठे मुसटण्डे मुताशाइर (अकवि) पुलिस की वर्दी में आए और घसीटते हुए डाॅ. अग्रवाल को अदालत से बाहर ले गए. सभी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं ने डाॅ. अगव्राल को दी गई सज़ा का विवरण मोटे-मोटे अक्षरों में विविध प्रकार के कार्टूनों के साथ प्रकाशित किया. कुछ साहित्यकारों ने इस फै़सले पर अफ़सोस जताया तो कुछ ने इस फै़सले का खैरमकदम (स्वागत) किया. डाॅ. अग्रवाल के कुछ शुभ चिंतकों ने साहित्यिक राष्ट्रपति के समक्ष मर्सी पिटीशन पेश की, किंतु राष्ट्रपति महोदय ने भी अदालत के फैसले को उचित ठहराया. बेचारे डाॅ. अगव्राल इन दिनों अदालत के आदेश की अनुपालना में मसरूफ़ हैं.
सुधि पाठकों को सूचित किया जाता है कि यह प्रतिबंधित पुस्तक व्यंग्य का ककहरा बीस हजार नए पैसे अथवा दो सौ रूपए मात्र का धनादेश भेज कर नई ग़ज़ल प्रकाशन शिवपुरी मध्यप्रदेश से प्राप्त की जा सकती है.राशि मिलते ही पुस्तक स्काईलेब द्वारा आपके पते पर भेज दी जाएगी.

डाॅ. मोईनुद्दीन शाहीन
सुलेमानी मदरसा के पास
मोहल्ला व्यापारियान, बीकानेर राजस्थान







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